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sushma k.


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महकता शहर

Posted On: 6 Jan, 2011  
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आखिर क्यों?

Posted On: 4 Jan, 2011  
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जीवन ही तुम हो और तुम ही जीवन हो

Posted On: 26 Dec, 2010  
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प्याज पर एक बवाल और…………;

Posted On: 23 Dec, 2010  
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अनुपमा अकेली………… कहा?????????????? है?

Posted On: 23 Dec, 2010  
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वादा ठहरा था

Posted On: 7 Dec, 2010  
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हकीकते तो मैं बयां……………………..

Posted On: 6 Dec, 2010  
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जरा मुस्कराएगा.

Posted On: 6 Dec, 2010  
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ये कविता

Posted On: 2 Dec, 2010  
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जब बात चली है.

Posted On: 2 Dec, 2010  
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4 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: sushma sushma

श्री राजेश जी ,जहा तक सभी शिक्षाओ का निचोड़ है वो यही है कि बुराई का कोई धर्म नहीं होता ,बुराई मानवता रहित होती है ,बुराई न तो औरत है न ही आदमी .........इसीलिए मैंने कहा कि "कुछ" ,उनको पुरुष भी कहलाने का अधिकार नहीं है .......पुरुष और नारी इस दुनिया में समाज में एक दूसरे के पूरक और निर्भर रूप से प्रभु के द्वारा रचित दो सुन्दर संरचना है जिससे प्रकृति गतिमान होती है.......इसलिए उन लोगो को कदापि पुरुष नहीं कहा जा सकता जो नारी अस्मिता को क्षति पहुंचाते है.........इसीलिए आप का यहाँ ये कहना कि "केवल पुरुष या पुरुषवादी मानसिकता को जिम्मेवार माना जाएगा" बिलकुल गलत है ............क्युकी ऐसे लोगो को पुरुष तो कहा ही नहीं जा सकता. दूसरी बात आपने कही "सच्चाई कहने वालों को" तो श्री राजेश जी आपसे बड़े दुखी मन से कहना चाहूंगी कि जिस निर्भया कि बात में मैडम साहिबा ने ऐसे बयां दिए है उसकी जिंदगी जितने क्रूर ढंग से ली गयी है ,,,भगवन ऐसी मौत तो दुश्मनो को भी नसीब न करे..................शायद आपके अंतर्मन ने वो चीखे न सुनी हो ,वो चीत्कार न सुनी हो जो उस बेचारी ने मरते हुए हर एक पल दी हो.........शायद आपको अंदाजा न हो कि एक गरीब या मिडिल क्लास के बच्चे जब अपनी व्यसायिक शिक्षा पूरी करते है तो एक माँ और ऐक पिता के खून कि एक एक बूंद उसमे लग जाती है .और जब समूचा पड़ा लिखा एक शरीर अपने प्राण छोड़ता है तो वो माँ पिता जीते जी मर जाते है...............निर्भया ने जितना सहा उसके लिए हैम जितना भी लिखे वो कम ही होगा उसने अपनी देह में जितने घाव खाये होंगे उससे ज्यादा अपनी आत्मा में खाये......उसकी आत्मा कितनी कराह रही होगी जब उसे ये दिखेगा कि एक औरत ही उसे इस प्रकार " सच्चाई " के तराजू में तोल रही है..........बहुत बड़े शब्द लिखने से पहले एक बार बस उस दर्द का सामना कर उसे अपनी आत्मा से महसूस कीजिये..........................................................................................सबकी जिंदगी एक ही तरह खुशगवार नहीं होती कोई सारी जिंदगी मखमली चादरों में बिना कुछ किये सोता है और कही कही जिंदगी दर्द से कराह कर सिसकियाँ भी लेना भूल जाती है,कभी निकलिए उस दर्द कि ओर जो उन चेहरो पर बिखरा है जहाँ कोई सुनवाई नहीं होती,कोई कानून नहीं होता ,कोई जिंदगी नहीं होती.................. ..........................................

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

आदरणीय उमासंकर जी आपको भी सदर प्रणाम ,जिस तरह सफलता शार्टकट के रास्ते नहीं मिलती,ठीक उसी तरह परिस्तिथि बोल कर नहीं मिलती . आपने कहा "अगर कोई रेवड़ी की तरह आपको फलैट व् कार बाट रहा है" आप शायद वाकिफ भी हो तो कोई आश्चर्य नहीं है की ये कथित "रेबडी " एक दिन में या अचानक नहीं बटती.इसे बाटने वाला जब अपने मनसूबे बना कर चलता है तो वो कई बहाने कई पुरस्कार कई सम्भोधन कई आत्मीयता कई संभावनाएं कई सवेद्नाएं इन सबमे मिलाकर चलता है.और पाने वाले को एक भ्रम की सी स्तिथि हो जाती है क्योकि जो घटित हो रहा होता है वह संभवत: प्री प्लान होता है और उसमे शक की गुंजाईश बहुत ही कम रहती है. आप गीतिका के मामले में अगर एक बार लालच ले भी आयें तो ऐसा आप बिहार की उस लड़की और फिजा के मामले में नहीं कह सकते.एक लड़की औरत अपने लिए सागर और पूरा असमान नहीं मांगती ,हा कभी कभी उससे चुनाव करने में गलती जरुर हो जाती है पर वो छोटी छोटी खुशियाँ चाहती है और इस चक्कर में कई बार फरेब का शिकार हो जाती है...............यहाँ आपने "गलत इस्तेमाल " करने वाले को बिलकुल बेदाग रखा है.एक बार और गोर किझियेगा.

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

क्या आप सब मर्द ये लिखित दे सकते है की जब ऐसा होगा तब नि: संदेह यौन दुर्व्यवहार रुक जायेगा/// प्रिय सुषमा जी ..सुन्दर प्रश्न आप के ..सार्थक लेख ..लिखा पढ़ा तो सारा क़ानून हमारा धरा है आज कहाँ काम करता है ..जहां देखों उसमे छेद है ...और उस कानून का दुरूपयोग है ...सो लिख कर देने से क्या हो जाएगा लेकिन हाँ निर्वस्त्र घूमने से, बार में मजमा लगाने से, छोटे कपडे पहनने से, काम को भड़काने का काम तो होता ही है ..जहां आप को नहीं लगता की कुछ होता है उसका प्रतिफल प्रतिरूप दूसरी जगह जन्म ले लेता है ..चाहे वह रात में हो ...चाहे जाड़े में हो ..जहां मौका मिला अग्नि भड़क जाती है जो मानसिक रूप से विकृत हो चुके हैं उनकी ..वे मानसिक रोगी कहो पागल कहो या लम्पट ..मौके का फायदा उठा लेते हैं केवल गंवार लडकियां नहीं बहुत पढ़ी लिखी नौकरी की तलाश में ..नायिका बनने की चाहत में ...भी फंस जाती हैं जाल में ...कुछ शौकिया भी खुद रूचि लेकर ..बाद में यौवन उत्पीडन बन सामने आता है .. सो बहुत से कारण हैं इस घिनौने काम के ...अपवाद हर जगह है ..हमें इस का पुरजोर विरोध करना चाहिए ..औं चाहे जिन कारणों से ये बढे उसे रोकना चाहिए .. जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा:

मुझे इस परिवर्तन के जिक्र में कहीं न कहीं जिसे वृद्ध कहकर कहा गया है वह अन्ना की और इन्गति कर रहा है | यह बिलकुल सही है कि परिवर्तन कि राह युवा कि कर्मठता से ही बनेगी पर युवा अधिकतर पैसे कि चकाचोंध से ग्रसित है और अच्छे से अच्छा भारतीय दिमाग विदेशों में अपने बढने के सपने पुरे कर रहा है और विदेशी भी कोई खैरात नहीं दे रहे वे इन दिमागों से बेहतरीन अनुसन्धान करके पुनः उने दुने कम रहे है | युवा मन से राजनितिक प्रतिबधता लगभग खत्म हो गयी है | यदि सही सुन्दर संसार कि कल्पना करनी है तो केवल उत्क्रष्ठ्ता कि पूजा ही नहीं करनी पड़ेगी वरन सामाजिक समानता को लाना होगा | मॉल और मल्टीप्लेक्स , डांसिंग डेटिंग में ब्यस्त युवा कहीं देश के सम्मान कि तलाश से दूर अपने सुख तलाश रहा है | अन्ना ने एक इतनी बढ़ी बहस कर[पशन के विरोध में ला दी जिसकी जरुरत भारतीय गणतंत्र में स्वाधीनता के बाद से ही थी पर गैर पढ़ा लिखा रोटी रोज़ी अज्ञानता में रहा और एक बड़ा मध्य वर्ग करप्शन के सत्त्य्हं जीना सीख गया | उदार वाद आया फिर आया बेहतर सड़कों स्टार होटल, बार, पाश्चात्य चमक दमक जिसे आधुनिक सांस्कृतिक होना बताया जाने लगा | किसी राजनितिक विरोध से युवा विमुख < देश में भूख होती आत्महत्या से कोई मतलब नहीं आतंकवाद से भी समझोता , हमको आओ मर जाओ हम डरते नहीं दुसरे दिन से मुंबई काम पर जाती रही है | abhi केवल संभल के चलने और तमाशा देखने काम नहीं शायद बहकाना भी पढ़े जिससे सड़क पर बहस झिदे कि यह नपुंसक राजनीती जिसने अहमें गर्तमें पंहुचा दिया सबसे भ्रष्टतम होने का तमगा भी दिलवा दिया में शायद गौरवान्वित महसूस न कर पाऊं हाँ आशावाद के नाम पर दिल बहलाने को कुछ भी कहलवा लें लेख कि दिशा सही है और इअरादा नेक है बधाई शुष्मा जी

के द्वारा: RaJ RaJ

आदरणीय सुषमा जी, नमस्कार, आपका इस पोस्ट का उत्तरवर्ती भी पढ़ा, वैचारिक रूप से उन महानुभाव से असहमत होने के कारण उस पोस्ट से कुट्टी कर इसी से मिल्ली कर लेता हूँ और यह क्या लिख दिया है आपने? लाहौल विला कुव्वत, सारे ख्वातीन को एकै कैटेगरी में? हमारे एक परिचित XYZ महोदय से मैं हमेशा प्रताडित रहता हूँ, जब ऊ गल्चौरा करने लगते हैं तो खुदा खैर करे एक एक की पूरी जन्मकुंडली बयाँ कर देते हैं|एक बार उनकी साईकिल को चोर उठा कर ले गएँ, मुझे लगा की पूरा संसद ही गूँज उठेगा, एक महीना तक साईकिल, साईकिल, साईकिल|अबकी हांथी पर बैठ गए हैं...और मेरे कान में दम हो गया है|बहुत ही सुन्दर व्यंग्य रचना...साधुवाद|जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

आदरणीय सुषमा जी .....सादर अभिवादन ! *आपकी इस कविता का शीर्षक लिखने से रह गया है .... *अगर आपने इसको कापी पेस्ट करके लिखा है तो एक बार पेस्ट करने पर लाइने अक्सर उपर नीचे हो जाया करती है ...... उसको फिर से कट करके दुबारा से मैटर को सलेक्ट करके फिर से कापी पेस्ट करेंगी तो विषय हुबहू वैसा ही दिखेगा ..... *आपकी यह रचना वाकई में प्यारी मासूम और न्यारी है ..... आज एक बार फिर से कहना पड़ रहा है की आपने उम्मीद से ज्यादा अच्छा लिख कर दिखाया है ..... मुबारकबाद (वैसे जो भी मेरे मेहनत से दिए गए कमेन्ट का निरादर करके अपने ब्लॉग पर उसका उत्तर नहीं देता /देती फिर दुबारा उस ब्लॉग पर हाजरी लगनी नामुमकिन हो जाती है - फिर तो हम भी पढ़ो और चुपचाप निकल लो वाली कहावत पर अम्ल करते है )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

गोविन्द जी आपकी प्रतिक्रिया पड़कर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ.क्योकि हम में से आधी जनता को ये प्रूर्ण विश्वास है की भगत सिंह होना चाहिए लेकिन मेरे घर में नहीं.......यहाँ आपने लिखा है रामदेव जी का विरोध::::::::तो सबसे पहले यहीं मैं आपकी बात को सही करना चाहती हू की यहाँ यक्ति विशेष श्री रामदेव जी का विरोध कतई नहीं किया है बल्कि उनकी "देखा देखि " नीति का विरोध किया है.आप निगमानंद को जानते है?नहीं जानते?///////// बड़ी ख़ुशी की बात है. क्योकि आपको उन्हें जानना चाहिए जो खुद करोर्ड़ो का मालिक हो. योग के दर्शन के मध्य आत्मचिंतन करना और कराना,लोगो को उनकी आत्मा से जागृत करना ज्यादा तथ्य परक है बजाय कि पूरे मीडिया को बुलाकर सलवार कुरता पहनकर भागने के. अमिताभ बच्हन अभी नयी मूवी में आ रहे है "बुढहा होगा तेरा बाप" प्लीज किसी बुध्हे को मत कह दीजियेगा कि motivate हो जाये.नहीं तो पता नहीं........... योग या भ्रस्टाचार या ऐसी ही कई चीज़े जिनमे रामदेव व् अन्ना हजारे जैसे बुधिजीवी व् जागरूक लोगो ने पथ प्रदर्शक की भूमिका निर्वहन किया है.हमें उन प्रतिएक चीजों में उन्हें ही ताकते रहने की बजाय उसकी शुरुवात सबसे पहले खुद से करनी चाहिए.और अगर ऐसा आप कर पाए तो "लोग आपको देखे या न देखे ,जाने या न जाने" आप सबसे सच्चे नागरिक होंगे. यहाँ साथ खड़े होने की जरुरत नहीं है बल्कि "खुद खड़ा" होने की जरुरत है.एकलव्य बनने की जरुरत है.उन्होंने हमें मार्ग दिखा दिया है हमें उस मार्ग पर चलने की जरुरत है. सच कहू आपको अगर हम में से प्रतिएक अगर इनके सिखाये मार्ग पर चलने लगा तो शायद न किसी संत को अपनी भूमिका के विरुद्ध जाना पड़ेगा, न कोई नेता बुरे काम करेगा,न किसी आम आदमी को भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने कि जरुरत पड़ेगी. यहाँ इस ब्लॉग में आपके जवाब के जरिये मैं अपनी यक्तिगत बात भी रखना चाहती हू"अपने कार्य छेत्र में मैंने भी कुछ ऐसा ही शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है.पर मेरे पास न मिडिया है न न्यूज़ पेपर ,पर मैं आश्वस्त हू अपने होसले के प्रति. मुझे पता है अब मेरे विरुद्ध कई षड़यंत्र पनप जायेंगे .कई अनसुलझे प्रशन खड़े हो जायेंगे .मुझसे मांग कि जाएगी कि,मैं किसी भी कार्य में जरा सा भी इंच भर कमी न छोड़ू.पर मैं परफेक्ट तो नहीं हू,ये भी मुझे पता है. तो सिर्फ मेरी कमी ढूढने वाले मेरे पीछे पद जायेंगे. यहाँ मैं आपसे पूछती हू क्या आप मेरा साथ देंगे?

के द्वारा:

सच में ये सुनकर बड़ा अजीब लगता है की लोग रामदेव जी का विरोध कर रहे हैं. मुझे केवल उन लोगो से एक ही चीज पूछनी है की अगर वो yog करते हैं और उन्होंने कुछ अच्छा करने के लिए कदम उठाया तो क्या गलत किया.. हम्मे से कितनो ने इन नेताओ को सुधरने के लिए कदम उठाये हैं. अगर कोई अच्छा कदम उठा रहा है तो लोग उसके साथ क्यों नहीं खड़े हो रहे हैं केवल इसलिए की वो नेता नहीं है मंत्री नहीं है संत समाज का है बस यही कारन है| अगर उन्हें राजनीती में आना भी है तो भी अगर भारत का पैसा भारत में वापिस आ सकता है तो हम उसके साथ क्यों नहीं है.| मुझे राजनीती की इनती समझ नहीं . इसलिए अगर कुछ गलत लिखा हो तो क्षमा चाहता हु.. पर मेरे प्रश्नों का उत्तर भी जानना चाहता hu

के द्वारा:

के द्वारा: sushma sushma

आदरणीय राज कमल जी , क्षमा प्रार्थी हू यदि मेरी कही गयी बात को अन्यथा लिया गया है . मेरा मानना है अपने देश व् प्रदेश के लिए हमें झूझना व् कभी कभी अपने हक के लिए लड़ना भी पड़ता है. पर हर बार तरीके वही नहीं होने चाहिए . यदि आप एक सम्मान जनक इस्तिथि में है , या नहीं भी है तो आपको अपने तरीके अलग करने चाहिए. हमें बाबा रामदेव जी अपने योग व् योगा के ज्ञान से बहुत कुछ दे सकते है तो क्यों अनावश्यक वे अन्यत्र राजनीती में गोते लगाना चाहते है. अन्ना जी के दुह:साहसिक कार्यो से हमें प्रेरणा अवश्य लेनी चाहिए पर यदि हममे इस्तिथि से निपटने के लिए कुछ और वयवस्था है तो क्यों न उन्हें प्रभावी करे. आपके मार्ग दर्शन की सदेव अपेक्षा रहेगी.

के द्वारा: sushma sushma

सुषमा जी ....नमस्कार ! आप का लेख बहुत मेहनत से लिखा गया +तैयार किया गया हैऔर अच्छा भी है ही ...... लेकिन जब कुछेक लोग उनके प्रति अपनी श्रधा रखते है भले ही उनकी कैसी भी किसी भी कारण से भावना हो हमे किसी हद तक उनकी भावनाओं का सन्मान करना ही चाहिए ..... यहाँ पर हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है ..... मै खुद जल्दी -२ किसी बाबा जी पर विश्वाश नहीं करता हूँ ...... हमारे शहर में भी जब रामदेव जी आये थे तो मै केवल इस लिए नहीं गया था की वोह फ़ीस वसूलते है बल्कि इसलिए की मेरी आत्मा जहाँ जिस के पास जाने की गवाही देती है मै सिर्फ उसी के पास जाता हूँ ..... मेरी भी यही कामना है की वोह अपने योग के माध्यम से देशवासियो और जरुरतमंदों का भला करते रहे ...... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: sushma sushma

हरेक भारतीय का सपना, राज जी ये सही है की बुराई के लिए लोग कुछ एक प्रतिशत ही बचते है.और मुझे बड़ी ख़ुशी है मेरे पिता जी को मैंने हमेशा ईमानदारी का साथ देते हुए देखा और यही वजह थी कि मेरे पिता जी को कही झुकना नहीं पड़ा .हा ये अलग बात है कि मेरे पिता जी के सच में साथी काफी कम बने पर जीवन में कोई मलाल नहीं रहा कि कोई गलत काम किया हो .अब मेरा सफ़र शुरू हुआ है और मैंने भी अपने पिता के राह पर ही कदम बढाया है,हलाकि बहुत बार बेबसी लगी है,और डर भी.क्योकि सब कुछ आँखों के सामने देखते हुए भी सच कहने का साहस नहीं आता. लोग उलटे हमें गलत तरीको से फ़साने का प्रयास करते है.पर शुक्र है उस आस्था का जो हमें हमेशा सच का साथ देने के लिए मजबूर कर देती है. " कुछ लोग कहते है " ये जो आग आपमें है उसे बुझने मत देना " इसलिए इसको हरेक भारतीय का सपना कहना चाहूंगी क्योकि जरुरी नहीं कि अगर हम चुप है तो हम उस बात को चाहते नहीं की सब कुछ सही हो जाये ,बस साहस नहीं कर पाते. या फिर हमें वो जरुरी बाते पता नहीं होती कि बात को कैसे और किससे कहा जाना चाहिए? हम तो राज कमल जी यहीं कहेंगे कि सच में बहुत आनंद है

के द्वारा: sushma sushma

सुषमा जी ....नमस्कार ! भ्रष्टाचार (bhrashtachaar) आपके विचार किरण बेदी जी पर मेरे से मिलते जुलते है ..... अगर उनको मेगाससे पुरस्कार न मिलता तो शायद हमारे देश में उनको आज कि डेट में इतना सन्मान भी न मिल पाता ..... और रही बात मेरे लेख के शीर्षक कि तो आप ही बता दीजिए कि उसका न्य शीर्षक क्या होना चाहिए ..... मैंने पहले भी अपने एक लेख का शीर्षक आदरणीय रमेश वाजपेई जी और आदरणीय भाई जी कहींन (अरविन्द पारिक ) जी के कहने पर बदला था , क्योंकि मैं लचीला रुख अपनाता हूँ .... एक बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता हूँ जब हममे से ज्यादातर लोग हमाम में एक समान है तो फिर इस बुराई के खिलाफ तो कुछेक प्रतिशत लोग ही बचते है , इसलिए इसको हरेक भारतीय का सपना कदापि नहीं कहा जा सकता है ..... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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के द्वारा: Rahul Goyal Rahul Goyal

आकाश जी बधाई मेरा यह कहने का तात्पर्य कतई नहीं था की ,इस विषय पर भासन न दिए जाये .बल्कि मेरा कहना है की जिस प्रकार वे इस बात को समझेंगे उसी प्रकार इस बात को उन्हें समझाया जाये.हर बात के कहने की थोड़ी सी रुपरेखा अगर बदल दी जाये तो बात की गहराई बदल जाती है.इस प्रकार की आप कहे ,\"क्या बकवास लगा रखी है आप इस काम को इसी तरह करे .\" or अगर इसे इस तरह कहा जाये कि,\"आपका सुझाव तो काफी बढ़िया है,लेकिन इस बार हम इस काम को इसी तरह कर लेते है. /या कि फिर बच्चो से कहा जाये कि ,\" तुम लोग पड़ते लिखते तो हो नहीं.चलो मैं प्रश्न पूछती हू? या ,\"तो पढाई वधाई बहुत हो गई चलो आज प्रश्न प्रश्न खेला जाये. अब आप मुझे समझ सकते है.

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: seema singh seema singh

के द्वारा: sushma sushma

रिश्तों के सन्दर्भ में एक छोटी सी कथा याद आई वो बाटना चाहता हूँ............. एक बार एक आदमी कबीर के पास आया और बोला की मैं अपनी विवाहित जिंदगी से दुखी हो चूका हूँ.... मेरी पत्नी और मेरे विचार मिलते है नहीं ...... क्या करूँ....... ? कबीर ने कहा रुको अभी बताता हूँ..... और ये कह कर उसने अपनी पत्नी को आवाज दी............ की यहाँ उजाला कम है जरा दीपक तो जला लाना......... और पत्नी दीपक जला लायी.........? आदमी चौंका ........एक तो दिन का समय ऊपर से .. बाहर जहाँ वो दोनों बैठे थे........... प्रकाश ही प्रकाश था........ फिर भी कबीर ने दीपक मंगाया और उनकी पत्नी ले आई........ ? फिर थोड़ी देर में कबीर की पत्नी पीने के लिए कुछ भोज्य पदार्थ लायी....... और कबीर से पूछा की कैसा बना है......... कबीर ने कहा बहुत स्वादिष्ट........... मेहमान चौंका .......... वो स्वादहीन था........ बल्कि खाने में बहुत ही ख़राब था........... मेहमान को लगा की न जाने मैं क्यों यहाँ आ गया....... पर तभी....... कबीर ने कहा ...... हैरान न हो........ ये मंत्र तुम भी अपना लो ........ दांपत्य में हर वास्तु मूल्य या गुणधर्म से नहीं तोली जाती........... इसमें भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए........ तुम अपनी पत्नी की भावनाओं का सम्मान करो और वो खुद तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करने लगेगी........................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: sushma sushma

सुष्माजी, सानिया प्रकरण में जो बवाल है वह इस वजह से कतई नही है कि सानिया पाकिस्तान के किसी शख्स से शादी कर रही है बल्कि इस वजह से है कि वह जिस शख्स से शादी कर रही है वह सही नही है, और सभी खेल प्रेमी पाकिस्तान को भली भांति जानते है, कल को अगर पाकिस्तान सानिया को टेनिस न खेलने दे क्योंकि जब वहां महिलाए प्रदे के बिना बाहर नही निकलती तो खेलेंगी कैसे और वहां के हालात जिस देश की सबसे बडी महिला भुट्टों की हत्या हो गई हो वहां कैसे सानिया आराम से रह सकती है. साथ ही यह आपकी गलतफहमी है कि बाकि लोग इस शादी से खुस नही है बल्कि वह तो और भी खुश है कि एक टेनिस स्टार का रिशता एक क्रिकेट स्टार से जुड रहा है ब्स परेशानी है तो उस झुठ से जिस पर यह रिशता बन रहा हैं

के द्वारा:

के द्वारा: sushma sushma

के द्वारा: ASHISH RAJVANSHI ASHISH RAJVANSHI

के द्वारा: sushma sushma




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