sushma's view

Just another weblog

63 Posts

373 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 761 postid : 516

एक और कहानी ,कहानी ,कहानी

Posted On: 23 Aug, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कहानी दर कहानी बढती जा रही है .हम सभ्यता के पायदान चड़ते जा रहे है रोज़ नए और नए .उचाईयों को पाने की जद्धो जहद हमें आगे बदने के लिए प्रेरित करती रही है. हम इक्कीसवी सदी की तरफ आगे बढ रहे है. अगर नहीं बढ रहा तो औरतो के प्रति मर्दों की वही एक तर की सोच . मानती हू कि बहुत से ऐसे कहते मिल जायेंगे कि औरतो कि ही गलती है …क्यों भाई ? औरतो कि गलती है क्या पुरुष पे किसी प्रकार के लगाम कि जरुरत नहीं है.ladki लड़की को पैदा होते ही मार डालना ज्यादा बेहतर प्रतीत होता है इस दुनिया में कडुवे पन को झेलने से तो . अगर आदमियों कि बात करे तो उसके राक्षस मन में औरतो के प्रति भोग्या वाली ही सोच होती है….जब हर जगह औरतो को कम महत्वहीन समझा है इस दुनिया ने तो कैसे वो इन पुरुषो के गलत हरकतों पे सिर्फ और सिर्फ औरतो को ही गलत ठहरा सकती है. पुरुषो के प्रपंच को छुपाने के लिए इस तरह के ढोंग किये जाते है कि दुनिया सिर्फ औरत को ही गलत समझे. पुरुष क्या दूध पीता बच्चा है क्या ,जो औरत के जल में फस गया . जबकि सच्चाई तो ये है कि पुरुष किसी लड़की या औरत पर एक बार बुरी नजर डाल लेने पर उसे किसी भी तरह पाने पर अमादा हो जाते है वो गोरवान्वित होते है इस प्रकार अपने हठ को पूरा करके .और पुरुष ऐसा करने के लिए किसी भी स्तर पर उतर आने को तेयार रहते है .बात चाहे बिहार कि हो या geetika-jpgमुंबई कि या फिर चंडीगड़ कि सभी में एक सामान बात ये है कि पुरुषो ने अपने को किंग साबित करने के लिए लड़की और औरत कि जान ले ली. हाय है ऐसी औरत पर उसने जनम ही क्यों लिया. क्यों ऐसी हवा पर विश्वास किया जो उसकी कभी नहीं हो सकती ….वो चाहे कैसी हो हर इल्जाम केवल और केवल उस पर ही आना है.gitikaदुर्भाग्य है हमारा कि हम इस दुनिया में रहते है. इससे अच्छा तो लड़कियों औरतो का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाना चाहिए. क्योकि सोच और कानून बदलेगा ये तो हो ही नहीं सकता. गोपाल कांडा हो या चन्द्र मोहन ,इन्होने पुरे कर्मकांड कर लिए अपनी एक छोटी सी हवस को पूरा करने के लिए .जहा मुस्लमान धर्म अपनाकर निकाह किया अनुराधा बाली को जितने हो सकते थे उतने सपने दिखाए और अपनी मंशा पूरी करके चलते बने…….मैं नहीं जानती कि क्यों दूर दुनिया में रहने वाले एक मत से ऐसा क्यों कह देते है कि उनकी महत्व्कांचा ने उन्हें ऐसा कराया…पर क्यों और क्यों इसके लिए सिर्फ महिला ही दोषी होती है.ये सिर्फ महिला ही जानती है कि कैसे एक पुरुष अपने जाल में फ़साने के लिए अड़ी चोटी का जोर लगा देता है …और फिर सुंदर सपने किसे अच्छे नहीं लगते ..क्या सपने देखने का हक केवल पुरुषो को है. आगे बड़ने कि ललक सिर्फ पुरुषो के ही हिस्से में लिखी है …इतना ड्रामा अगर ये न करते तो शायद आज ये भी हमारे बीच होती….बाप कि उम्र के भी परायीं लड़की के लिए भी ऐसा सोच रखते है कि जानकर ही रोगात्ते खड़े हो जाएँ .जहा कुछ सिस्टम से हार मान जाते है वाही कुछ इससे लड़ते भी है और निश्चित रूप से हार भी जाते है यहाँ विजय किसी के हाथ नहीं आती उम्र गुजरती जाती है और निरंतर आरोप प्रत्यारोप होते रहते है.कई बार स्त्री कि दुर्दशा भी हो जाती है कही तेजाब छिड़क कर और कही आरोपों में फसकर …………. तो क्या महिला का उचाईयों को पाने का सपना बेअसर है …क्या उन्हें सम्मान के साथ जीने का कोई हक नहीं .कोई रास्ता नहीं.क्या हमेशा ऐसा ही होता रहेगा .तो इस से तो अच्छा यही है कि भूर्ण ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

23 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
August 25, 2012

नकारात्मक सोच की जरूरत नहीं है बस समझ व सोच को बदलने की जरूरत है सही चित्रण बहुत बधाई

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय मनोरंजन जी , धन्यवाद् ………वास्तव में आज सोच व् समझ को बदलने की बहुत जरुरत है.पर परास्ना यहीं है कि ये कौन बदलेगा ……..क्या आप से सुरुवात हो सकती है ………और ये क्रम आगे बढाया जा सकता है……..मेरी सोच नकारात्मक कटाई नहीं है .मैं कभी भी अपने जीवन में हर नहीं मानती पर दुःख होता है ये देखकर कि कुछ बिना लड़े ही हरने का फेसला कर लेते है ……..ऐसा नहीं होना चाहिए……….पर वास्विक इस्तिथि इससे कही भिन्न है आप सोच भी नहीं पाएंगे कि कैसे गलत आदमी अपने हर हथकंडे चलता है ……….और अपने नापाक इरादे पुरे करने कि कोशिश करता है……..निःसंदेह आगे मैं ऐसा कुछ जरुर लिखूंगी ……..

vikramjitsingh के द्वारा
August 25, 2012

आपका कहना एक दम सत्य है…….लेकिन भ्रूण हत्या को जायज़ ठहराना असंगत प्रतीत होता है…. क्योंकि पाँचों ऊँगलियाँ कदापि बराबर नहीं हो सकतीं…..

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    विक्रम जी आपने पड़ा होगा मैंने अंतिम लाइन पूरी नहीं की है .क्योकि मैं ऐसा नहीं चाहती ………..लेकिन ये मैं उन लोगो को बताना चाहती हु की दुनिया में पुरुष और स्त्री एक दुसरे के पूरक है ना कि स्त्री पुरुषो कि मात्र भोग्या…..पांचो उँगलियाँ बराबर नहीं होती पर वो चार उँगलियाँ कहा है?

Chandan rai के द्वारा
August 25, 2012

शुष्मा जी , एक बेहतरीन लेख के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन !

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय चन्दन जी बहुत बहुत धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
August 25, 2012

सुषमा जी, एक सीमा रेखा तय होनी चाहिए या फिर बुराइयों से लड़ने की ताकत. आत्महत्या तो कायरता की निशानी है!

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय सिंह जी नि:संदेह आत्महत्या कायरता की ही निशानी है .लड़ना अपने लिए ही जरुरी नही वरन दुनिया को सही रस्ते पर ले जाने के लिए भी जरुरी होता है……..पर जिस सीमा रेखा की आप बात कर रहे है कभी कभी “परिस्तिथि” और “बुरी नियत” और “बुरी किस्मत” इस प्रकार एक साथ हो जाते है मानो उन्होंने कल का ही रूप धारण कर लिया हो…………

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय सिंह जी नि:संदेह आत्महत्या कायरता की ही निशानी है .लड़ना अपने लिए ही जरुरी नही वरन दुनिया को सही रस्ते पर ले जाने के लिए भी जरुरी होता है……..पर जिस सीमा रेखा की आप बात कर रहे है कभी कभी “परिस्तिथि” और “बुरी नियत” और “बुरी किस्मत” इस प्रकार एक साथ हो जाते है मानो उन्होंने काल का ही रूप धारण कर लिया हो…………

yogesh के द्वारा
August 25, 2012

सही कहा आपने फिर वही कहानी कहानी…. और ये कहानी बहुत पुरानी है…. शायद इसी कहानी यानि पुरुषों की की कुत्सित नज़रों से बचने के लिए पर्दा प्रथा या बुरका प्रथा का जन्म हुआ..इसी से बचने के लिए सती प्रथा या जौहर प्रथा जैसी बीभत्स प्रथाए इस समाज में थी… कई बार मामला ताकतवर और कमजोर का होता है या अमीर या गरीब का होता है…

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय योगेश जी आपकी बात बिलकुल जायज है.कुछ प्रथाएं बस इसलिए ही शुरू हुई थी………………और कई बार मामला ताकतवर और कमजोर का होता है या अमीर या गरीब का भी होता है.

rekhafbd के द्वारा
August 24, 2012

सुषमा जी ,बढ़िया आलेख ,बधाई

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय रेखा जी बहुत बहुत धन्यवाद

umashankarsrivastava के द्वारा
August 24, 2012

आदरणीय सुषमा जी सादर प्रणाम | सफलता शार्टकट के रास्ते नहीं मिलती | उसके लिए शंघर्ष करना पड़ता है | अगर कोई रेवड़ी की तरह आपको फलैट व् कार बाट रहा है तो समझ लीजिये की वो आपका गलत इस्तेमाल करेगा | जरा सी लालच में जान.मान सम्मान सबसे हाथ धोना पड़ेगा |

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय उमासंकर जी आपको भी सदर प्रणाम ,जिस तरह सफलता शार्टकट के रास्ते नहीं मिलती,ठीक उसी तरह परिस्तिथि बोल कर नहीं मिलती . आपने कहा “अगर कोई रेवड़ी की तरह आपको फलैट व् कार बाट रहा है” आप शायद वाकिफ भी हो तो कोई आश्चर्य नहीं है की ये कथित “रेबडी ” एक दिन में या अचानक नहीं बटती.इसे बाटने वाला जब अपने मनसूबे बना कर चलता है तो वो कई बहाने कई पुरस्कार कई सम्भोधन कई आत्मीयता कई संभावनाएं कई सवेद्नाएं इन सबमे मिलाकर चलता है.और पाने वाले को एक भ्रम की सी स्तिथि हो जाती है क्योकि जो घटित हो रहा होता है वह संभवत: प्री प्लान होता है और उसमे शक की गुंजाईश बहुत ही कम रहती है. आप गीतिका के मामले में अगर एक बार लालच ले भी आयें तो ऐसा आप बिहार की उस लड़की और फिजा के मामले में नहीं कह सकते.एक लड़की औरत अपने लिए सागर और पूरा असमान नहीं मांगती ,हा कभी कभी उससे चुनाव करने में गलती जरुर हो जाती है पर वो छोटी छोटी खुशियाँ चाहती है और इस चक्कर में कई बार फरेब का शिकार हो जाती है……………यहाँ आपने “गलत इस्तेमाल ” करने वाले को बिलकुल बेदाग रखा है.एक बार और गोर किझियेगा.

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
August 24, 2012

|आदरणीय सषमा जी, बहुत खुबसूरत आलेख ,,,,गीतिका के केश में गीतिका के माँ-बाप भी जिम्मेदार हैं।

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय अनुराग जी बहुत बहुत धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
August 24, 2012

आदरणीय सषमा जी, आपकी बातें शतप्रतशत सही हैं, लेकिन फिर भी मुझे लगता है गीतिका के केश में गीतिका के माँ-बाप भी जिम्मेदार हैं।  क्या वह नहीं समझते थे कि घुंटाल सांडा उसकी बेटी को जो सुविधायें दे रहा है वह उसकी पात्र है। और क्यों इतनी अधिक मेहरवानी कर रहा है। बीएमडब्लू कार, फ्लैट आदि देने के क्या औचित्य है।

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय दिनेश जी बहुत बहुत धन्यवाद, परिस्तिथि कभी कभी घटित होते हुए कोई संकेत नहीं दे पाती और वे एक बड़े कांड में तब्दील हो जाती है.यहाँ भी ऐसा ही हुआ .गीतिका बहुत छोटी थी उसकी क़ाबलियत कहा और कैसी थी ये ऑफिस में प्रकट होता था न की माँ बाप के सामने.ये जीवन बाद विचित्र है यहाँ कभी कभी असमान्य बातें हो जाया करती है.सपने डोर से छुटकर बहुत दूर उड़ जाया करते है.गीतिका गलत होती तो वह अभी भी जिन्दा होती और ऐश कर रही होती पर जब तक उसने समझा सब गलत हो गया है तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी………कांडा के ऑफिस के स्तर से शायद वो ये जन ही नहीं पायीं की जो उसे मिल रहा है वो उसके लिए मात्र भ्रम जाल है.

pitamberthakwani के द्वारा
August 24, 2012

सुश्री सुषमा जी,नमस्ते! आप १००% सही हैं मैंने भी अपनी पोस्ट “मर्द बड़े कमीने होते हैं ” में यही तो लिखा है आप तो नारी हैं नारी के हक़ में लिखा है मैंने तो पुरुष होकर भी नारी के हक़ में और पुरुषों के विरुद्ध ,जो की सही है लिखा है आप को कोई भले ही यह कह दे की आप नारी की तरफदारी कर रही हैं तब आप मेरी पोस्ट का हवाला देकर उन्हें बता सकती हैं. आप मेरा नमन स्वीकारे जी, आप सच में महान हैं!

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय पीतम जी बहुत बहुत धन्यवाद,

    sushma के द्वारा
    August 28, 2012

    THANKS


topic of the week



latest from jagran