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ये कविता

sushma's view
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मैंने अपनी यक्तिगत diary से ली है,इसे मैंने तब लिखा था जब मैं स्कूल में पढ़ा करती थी.तब कोई माध्यम नहीं था की मैं अपनी कविता को कही छपवा सकती,किन्तु जागरण के इस ब्लॉग के माद्यम से मैं अपनी पुरानी खवाहिश को फिर से जिन्दा करने की कोशिश कर रही हू.मैं तब बहुत छोटी हुआ करती थी जब मैंने लिखना शुरू किया था.मुझे अच्छी तरह से तो याद नहीं,पर मैंने इसे छठवी कक्षा से लिखना शुरू कर दिया था.आज मैं इसे लिखते हुए कुछ भी परिवर्तित नहीं कर रही हू,जैसा तब लिखा था वैसा ही आज लिख रही हू.आशा है आप पढेंगे.

जिंदगी से गिला नहीं कुछ दोस्त बेकार थे.
समझे थे जिनको कांटे वो ही अपने यार थे.
खिज़ा ही उनके वश में थी यार,
ना जान पाए उनको जो आने वाली बाहर थे.
रहे जिनको हम अपना बनाकर,
वो तो”सुषमा”दो ही पल तक के खुमार थे.
तुम्हे गम तो होगा हमारी मौत का,
पर ये ना समझाना की जो मर गये वो समझदार थे

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